हिमालय में निर्माण और जोशीमठ जैसी तबाही का डर

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हिमालय में विकास और प्रकृति का टकराव अभी सबसे बड़े सवालों में से एक है, और जोशीमठ ने हमें इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण दिखा दिया।

क्या हो रहा है हिमालय में?
हिमालय की चट्टानें जवान हैं, ढीली हैं। ये भूकंप, बारिश और ग्लेशियर के पानी के लिए पहले से ही संवेदनशील हैं। जब हम इन्हें काटकर चौड़ी सड़कें, सुरंगें, हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाते हैं, तो पहाड़ की पकड़ कमजोर हो जाती है।

Char Dham Highway प्रोजेक्ट में ही 2022 की बारिश के बाद ऋषिकेश से जोशीमठ के बीच 250 km में 300+ लैंडस्लाइड हुए। स्टडी बताती है कि सड़क चौड़ी करने से लैंडस्लाइड दोगुने हो गए। जोशीमठ में NTPC की सुरंग के दौरान भूजल स्रोत फूट गया, जिससे पूरा शहर धंसने लगा। 37 पुल 5 साल में गिर चुके हैं, 27 और खतरे में हैं।

दिक्कत सिर्फ पर्यावरण की नहीं है
1. लोगों की जिंदगी: उत्तराखंड में घरों में दरारें, सड़कें धंस रही हैं। मसूरी में Landour Bazaar से Clock Tower तक इमारतें टेढ़ी हो रही हैं।
2. आजीविका: पहाड़ के लोग खेती-पशुपालन पर निर्भर हैं। जब जमीन खिसकती है, घर टूटते हैं, तो पलायन बढ़ता है।
3. जलवायु का डबल अटैक: ग्लेशियर पिघल रहे हैं, बारिश का पैटर्न बदल रहा है। 5000+ ग्लेशियर झीलें बन गई हैं जो GLOF का खतरा बढ़ाती हैं।
तो क्या विकास रोक दें?
नहीं, लेकिन तरीका बदलना पड़ेगा। इंजीनियर और सरकार के सामने नैतिक दुविधा यही है: बॉर्डर सिक्योरिटी और कनेक्टिविटी चाहिए, पर किस कीमत पर?

क्या किया जा सकता है?
1. सही EIA: किसी भी प्रोजेक्ट से पहले गहरा पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन जरूरी। कई बार प्रोजेक्ट को 50 हिस्सों में बांटकर क्लियरेंस से बचा जाता है। 2. ग्रीन इंफ्रा: रिटेनिंग वॉल, सही ड्रेनेज, ढलान पर पेड़ों की जड़ें बांधने वाली तकनीक। पेड़ की जड़ें मिट्टी का ‘गोंद’ हैं।
3. स्थानीय लोगों को साथ लेना: 2015 नेपाल भूकंप के बाद कुलुंग राई समुदाय ने 1 दिन में 3 बांस के पुल बना दिए थे। पारंपरिक ज्ञान + आधुनिक इंजीनियरिंग का मेल चाहिए।
4. Carrying Capacity: तीर्थयात्रा का मतलब तपस्या था, अब 4-लेन हाईवे से सुविधा दे रहे हैं। पर्यटकों की संख्या सीमित करनी होगी।
जोशीमठ चेतावनी है। हिमालय की एक सहने की सीमा है। अगर हम उसे पार करेंगे, तो प्रकृति अपना हिसाब खुद बराबर कर लेगी। विकास चाहिए, पर ऐसा जो पहाड़ के साथ चले, उसके खिलाफ नहीं।

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